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सोमवार, दिसंबर 28, 2009

प्रतिक्रिया

हमारे मित्र दिनेश कुशवाह ने वागर्थ के  अक्टूबर अंक में उदय प्रकाश प्रसंग पर, आज भी खुला है अपना घर फूकने का विकल्प, लम्बी कविता क्या लिख दी अब भाई लोग लट्ठ लेकर उन्हीं के पीछे पड़ गये हैं. कुछ लोग लिखकर खिलाफत कर रहें हैं तो कुछ फोन पर गरिया रहे हैं. फ़िलहाल मैं तो बस इतना ही कहूँगा कि तीर निशाने पर लगा है.
आप भी यदि दिनेश कि लानत-मलानत करना चाहते  हैं तो देर किस बात कि है, हां लेकिन इसके लिए आपको उनकी कविता तो पढ़नी पढ़ेगी. इसके लिए आपको परेशां होने की जरूरत नहीं. भारतीय भाषा परिषद् की साईट http://www.bharatiyabhashaparishad.com/  पर जाईये और कविता हाजिर.